कहीं पर लू तपाता है कहीं पर बारिशें भी हैं

मगर कुछ कर गुज़रने की हमारी ख़्वाहिशें भी हैं

अनोखे इश्क़ की तुम ये अनोखी शर्त तो देखो
उसी से प्यार करना है कि जिस से रंजिशें भी हैं

फ़क़त दुश्मन के डर से रोने वाले तुम ज़रा सोचो
हमारी राह में तो दोस्तों की साज़िशें भी हैं

ज़रूरी तो नहीं सब कुछ तुम्हारे मन मुताबिक हो
मियाँ ये ज़िंदगी है ज़िंदगी की बंदिशें भी हैं

उसी को याद करने से हमें फ़ुर्सत नहीं मिलती
उसी को भूल जाने की हमारी ख़्वाहिशें भी हैं

कि दर पर मौत आके रोज़ दस्तक दे के जाती है
मगर ज़िंदा बचे रहने की हर पल कोशिशें भी हैं

ज़रा सी बात पर घर छोड़ के जाना है गर तुम को
तो इतना जान लो बाहर हज़ारों गर्दिशें भी हैं

— Rituraj kumar

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