ऐ रब तिरी तलाश से उकता गया हूँ मैंचलते ही तेरी राह पे मुरझा गया हूँ मैंथोड़ा तो खोल दे तू भी दिल का किवाड़ अबहर बार ना-उमीद ही भेजा गया हूँ मैं— Sanjay Bhat