koi aise bhi mujh pe fida ho | कोई ऐसे भी मुझ पे फ़िदा हो

  - Shadab khan

कोई ऐसे भी मुझ पे फ़िदा हो
हर घड़ी बस मुझे सोचता हो

दर्द सारा दिया है उसी का
चाहता हूँ कि वो ही दवा हो

सारी महफ़िल की नज़रें हैं मुझ पर
नाम जैसे उसी का लिया हो

आठ सालों के लम्हें भुला दे
कोई इतना न हम सेे ख़फ़ा हो

छोड़ कर कब का वो जा चुका है
लगता है कल का ही हादसा हो

मुनफ़रिद ख़ुशबू है इस शजर की
ऐसा लगता है उसने छुआ हो

मत करो इतना भी याद उसको
ज़ख्म मुमकिन है फिर से हरा हो

  - Shadab khan

Zakhm Shayari

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