jab se usne dafn kii hain nekiyaan deewaar men | जब से उसने दफ़्न की हैं नेकियाँ दीवार में

  - Shajar Abbas

जब से उसने दफ़्न की हैं नेकियाँ दीवार में
ढूँढता हूँ तब से हर पल ख़ूबियाँ दीवार में

बस गई हैं आन कर कुछ चींटियाँ दीवार में
रख रहा हूँ इस लिए मैं रोटियाँ दीवार में

आज तक बदला नहीं दुनिया ने माज़ी का रिवाज
अब भी चुनवाते हैं ज़ालिम बेटियाँ दीवार में

ढा दिया दीवार को मैंने इसी इक आस पर
क्या पता मिल जाएँ तेरी चिट्ठियाँ दीवार में

रन के अन्दर सब्र के जलते दियों को देखकर
मारती हैं सर सितम की आँधियाँ दीवार में

जन्मदिन पर उसको जो तोहफ़े में दी थी चूड़ियाँ
तोड़कर उसने वो गाढ़ी चूड़ियाँ दीवार में

मुंहदिम दीवार-ए-दिल को कर के बोलीं बे-वफ़ा
अब नहीं आएँगी सुनिए झुर्रियाँ दीवार में

बादशाहों पर ख़ुदा की लानतें हों बे शुमार
मुफ़्लिसों की चुन रहे हैं हड्डियाँ दीवार में

जिस का दम घुटता हो दुनिया की हवा में दोस्तों
किस लिए बनवाएगा वो खिड़कियाँ दीवार में

गुफ़्तुगू करती हैं यूँँ गंदुम पे बैठी चीटियाँ
कीजिए आबाद चलकर बस्तियाँ दीवार में

काँप उट्ठा दिल ज़मीं का छा गईं वीरानियाँ
जब हुईं पैवस्त ग़म की बिजलियाँ दीवार में

इक तबस्सुम आ गया शाख़-ए-शजर पे दफ़अतन
घर बनाने लग गईं जब पत्तियाँ दीवार में

  - Shajar Abbas

Zakhm Shayari

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