जब से उसने दफ़्न की हैं नेकियाँ दीवार में
ढूँढता हूँ तब से हर पल ख़ूबियाँ दीवार में
बस गई हैं आन कर कुछ चींटियाँ दीवार में
रख रहा हूँ इस लिए मैं रोटियाँ दीवार में
आज तक बदला नहीं दुनिया ने माज़ी का रिवाज
अब भी चुनवाते हैं ज़ालिम बेटियाँ दीवार में
ढा दिया दीवार को मैंने इसी इक आस पर
क्या पता मिल जाएँ तेरी चिट्ठियाँ दीवार में
रन के अन्दर सब्र के जलते दियों को देखकर
मारती हैं सर सितम की आँधियाँ दीवार में
जन्मदिन पर उसको जो तोहफ़े में दी थी चूड़ियाँ
तोड़कर उसने वो गाढ़ी चूड़ियाँ दीवार में
मुंहदिम दीवार-ए-दिल को कर के बोलीं बे-वफ़ा
अब नहीं आएँगी सुनिए झुर्रियाँ दीवार में
बादशाहों पर ख़ुदा की लानतें हों बे शुमार
मुफ़्लिसों की चुन रहे हैं हड्डियाँ दीवार में
जिस का दम घुटता हो दुनिया की हवा में दोस्तों
किस लिए बनवाएगा वो खिड़कियाँ दीवार में
गुफ़्तुगू करती हैं यूँँ गंदुम पे बैठी चीटियाँ
कीजिए आबाद चलकर बस्तियाँ दीवार में
काँप उट्ठा दिल ज़मीं का छा गईं वीरानियाँ
जब हुईं पैवस्त ग़म की बिजलियाँ दीवार में
इक तबस्सुम आ गया शाख़-ए-शजर पे दफ़अतन
घर बनाने लग गईं जब पत्तियाँ दीवार में
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