main aise kamre kii zeenat badaa ke rakkhoonga | मैं ऐसे कमरे की ज़ीनत बड़ा के रक्खूँगा

  - Shajar Abbas

मैं ऐसे कमरे की ज़ीनत बड़ा के रक्खूँगा
तिरे ख़तों से ये कमरा सजा के रक्खूँगा

अगरचे याद मिरी आए तो चले आना
तुम्हारी राह में पलकें बिछा के रक्खूँगा

तमाम 'उम्र मैं चाहूँगा उसको शिद्दत से
मगर ये राज़ मैं उससे छुपा के रक्खूँगा

करेगी ख़ौफ़-ज़दा रौशनी चराग़ों की
चराग़ इसलिए घर के बुझा के रक्खूँगा

शजर हूँ अपने फ़रीज़े को यूँँ निभाऊँगा
समर का बोझ मैं ख़ुद पर उठा के रक्खूँगा

  - Shajar Abbas

Naqab Shayari

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