मैं ऐसे कमरे की ज़ीनत बड़ा के रक्खूँगा
तिरे ख़तों से ये कमरा सजा के रक्खूँगा
अगरचे याद मिरी आए तो चले आना
तुम्हारी राह में पलकें बिछा के रक्खूँगा
तमाम 'उम्र मैं चाहूँगा उसको शिद्दत से
मगर ये राज़ मैं उससे छुपा के रक्खूँगा
करेगी ख़ौफ़-ज़दा रौशनी चराग़ों की
चराग़ इसलिए घर के बुझा के रक्खूँगा
शजर हूँ अपने फ़रीज़े को यूँँ निभाऊँगा
समर का बोझ मैं ख़ुद पर उठा के रक्खूँगा
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