पैग़ाम दे रहा है ये रो रो के आसमाँ
हर सू मेरे नगर में हैं मंज़र धुआँ-धुआँ
तीर-ओ-तबर को वक़्त के बातिल को मात दी
मक़तल में हँस के जीत गया एक बे-ज़बाँ
ऐ शाहज़ादी तुम मुझे इसका जवाब दो
नक्श-ए-क़दम तुम्हारे मैं ढूँडू कहाँ कहाँ
सुनकर विसाल-ए-यार का पैग़ाम देखिए
करते हैं रक़्स अर्श पे ख़ुर्शीद-ओ-कहकशाँ
हक़दार हैं ये ख़ुल्द-ए-बरीं के सभी ख़ुदा
ये क़िस्सा-ख़्वाँ ग़ज़ाल शजर और नौहा-ख़्वाँ
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