tujhe zindaan-e-khamoshaan ki vehshat maar daalegi | तुझे ज़िंदान-ए-ख़मोशाँ की वहशत मार डालेगी

  - Shajar Abbas

तुझे ज़िंदान-ए-ख़मोशाँ की वहशत मार डालेगी
मुझे ये बज़्म-ए-मय ये बज़्म-ए-इशरत मार डालेगी

भटक जाएँगे हम सब मज़हब-ए-इंसानियत से गर
तो हमको नक़्ल-ए-मज़हब की सियासत मार डालेगी

ग़म-ए-हस्ती ग़म-ए-हिज्राँ ग़म-ए-दौराँ से बच जाऊँ
तो अहल-ए-इश्क़ की मुझको मोहब्बत मार डालेगी

हम अहल-ए-ज़िक्र अहल-ए-इल्म अहल-ए-फ़न को ऐ मुर्शिद
ये जाहिल दौर-ए-हाज़िर की हुकूमत मार डालेगी

शब-ए-ख़ल्वत से लेकर के शब-ए-फ़ुर्क़त के लम्हों की
शजर को याद-ए-रफ़्ता की अज़िय्यत मार डालेगी

  - Shajar Abbas

Political Shayari

Our suggestion based on your choice

More by Shajar Abbas

As you were reading Shayari by Shajar Abbas

Similar Writers

our suggestion based on Shajar Abbas

Similar Moods

As you were reading Political Shayari Shayari