उदासियों के समंदर को पार करते हुए
वो डर रहा था बहुत आँखें चार करते हुए
मैं अपनी आँखों की बीनाई को न खो दूँ कहीं
ऐ आने वाले तेरा इंतज़ार करते हुए
हाँ अपने बच्चों की दो वक़्त की गिज़ा के लिए
फिरे है जिस्म का वो कारोबार करते हुए
तू इंतिशार में इक रोज़ मारा जायेगा
ये बात जान ले तू इंतिशार करते हुए
क़सम से जब से मेरा ऐतबार टूटा है
शजर में डरता हूँ अब ऐतबार करते हुए
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