वफ़ा-ओ-इश्क़ के मैदान से निकालूँगा
मैं ख़ुद को हाल-ए-परेशान से निकालूँगा
घुटन सी होती है महसूस हर घड़ी इसको
मैं दिल को 'इश्क़ के ज़िंदान से निकालूँगा
मैं तेरी डोली के जैसे तेरी बिदाई के दिन
जनाज़ा अपना बड़ी शान से निकालूँगा
ज़माना जान निकाले है जिस्म से अपने
मैं अपने जिस्म को अब जान को निकालूँगा
वो जो गुलाब हसीं सा है उस गुलिस्ताँ में
शजर मैं उसको गुलिस्तान से निकालूँगा
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