zamaane waalon se door rahna zamaana KHud ko badal raha hai | ज़माने वालों से दूर रहना ज़माना ख़ुद को बदल रहा है

  - Shajar Abbas

ज़माने वालों से दूर रहना ज़माना ख़ुद को बदल रहा है
वफ़ा सक़ाफ़त हया निदामत का शम्स बे वक़्त ढल रहा है

हमारी आँखों के दर पे शबनम के चंद क़तरे ठहर गए हैं
हर एक क़तरा चमन के अन्दर मलाल भँवरे को खल रहा है

किसी की यादें चराग़ बनकर हमारी पलकों पे जल रही हैं
बदन किसी का गुलाब जैसा दिए की लौ से पिघल रहा है

हर एक रस्ते को यूँँ सजाओ गुलाब डालो बिछाओ पलकें
सबा ने आकर ख़बर सुनाई कि चाँद घर से निकल रहा है

तुम्हारी आँखों के मयकदे पर शजर की जब से नज़र पड़ी है
कभी शजर लड़खड़ा रहा है कभी शजर ख़ुद सँभल रहा है

  - Shajar Abbas

Environment Shayari

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