“फ़िलिस्तीनी”

सोचता हूँ हर लम्हा
ऐ मिरे ख़ुदा वंदा
बे गुनाह फ़िलिस्तीनी
तिफ़्ल नौ जवाँ बूढ़े
बे सबब भला कब तक
ऐसे मारे जाएँगे
इन सितम रसीदा के
ख़ूँ से ज़ुल्म के बानी
मुस्कुरा के ओर कब तक
ऐसे होली खेलेंगे
ऐ मिरे ख़ुदा वंदा
और कब तलक ऐसे
बे गुनाह लोगों के
घर उजाड़े जाएँगे
कब तलक यूँ माँओं से
उन की गोद के पाले
और छीने जाएँगे
बूढ़े बाप मक़्तल से
कब तलक जवानों के
ख़ूँ में डूबे लाशों को
बेबसी के आलम में
ऐसे अपने काँधों पर
और उठा के लाएँगे
इस तरह यतीमी का
दाग़ अपने सीने पर
ग़मज़दा फ़िलिस्तीनी
ऐ मिरे ख़ुदा वंदा
कब तलक उठाएँगे
सोचता हूँ हर लम्हा
ऐ मिरे ख़ुदा वंदा
बे गुनाह फ़िलिस्तीनी
तिफ़्ल नौ जवाँ बूढ़े
बे सबब भला कब तक
ऐसे मारे जाएँगे

— Shajar Abbas

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