“वसीयत“
हसीन लकड़ी मिरी मुहब्बत
मैं अब से पहले
ख़ुतूत लिखता रहा हूँ तुझ को
तुझे पता है
मैं अब से पहले सभी ख़तों में
ख़ुशी के अफ़्साने लिख रहा था
हसीन लकड़ी मिरी मुहब्बत
मगर ज़माना बदल गया अब
ये ख़त जो मैं ने तुझे लिखा है
पुराने वाले ख़तों के जैसा ये ख़त नहीं है
तमाम ख़त से ये ख़त जुदा है
हसीन लकड़ी मिरी मुहब्बत
ये ख़त नहीं है
ये ख़त की सूरत में मैं ने क़ासिद के हाथ तुझ को
वसीयतें हैं जो मेरी मैं ने वो सब की सब लिख के भेज दी हैं
हसीन लकड़ी मिरी मुहब्बत
मिरी गुज़ारिश है अब ये तुझ से
वसीयतें जो लिखी हैं मैं ने
हर इक वसीयत को मेरी पढ़ना
हसीन लकड़ी मिरी मुहब्बत
मिरे जनाज़े पे जब भी आना
कफ़न को रुख़ से मिरे हटाना
ग़मों की मारी हसीन लकड़ी
मिरी मुहब्बत ख़याल रखना
मिरी वसीयत का मान रखना
लिपट के मय्यत से जाँ न खोना
जुदाई में मत निढाल होना
हसीन आँखों से ख़ूँ न रोना
लहू से दामन को मत भिगोना
तड़प तड़प के न जान खोना
ग़मों की मारी हसीन लकड़ी
मिरी मुहब्बत ख़याल रखना
मिरी वसीयत का मान रखना















