चल पड़ा था मैं इक परी की तरफ़
फिर नहीं लौटा रौशनी की तरफ़
मेरी ये ज़ब्त करने की आदत
मुझ को ले आई शा'इरी की तरफ़
दुख में याद आती है उसी की मुझे
कितने रस्ते हैं इक गली की तरफ़
— Asad Khan
फिर नहीं लौटा रौशनी की तरफ़
मेरी ये ज़ब्त करने की आदत
मुझ को ले आई शा'इरी की तरफ़
दुख में याद आती है उसी की मुझे
कितने रस्ते हैं इक गली की तरफ़
Other ghazal from the same pen
Shers of aadat.
Voices in the same orbit
Poetry by feeling