आप नाहक़ ही ज़ुल्म ढाते हैं
और हम हैं कि मुस्कुराते हैं
तीर पे तीर छोड़ते हैं आप
फिर जिगर को भी आज़माते हैं
आप हैं ला-जवाब शा'इर दोस्त
हर किसी को पसंद आते हैं
मौसमों की ललक में क्या रोना
ये तो आते हैं और जाते हैं
ज़ख़्म तो भर गए सभी ऐ दिल
चल नया एक ज़ख़्म खाते हैं
पाप का मैल मन से धोने को
लोग गंगा में जा नहाते हैं
ये कहानी भी ख़ूब है अपनी
आँख में अश्क झिलमिलाते हैं
काम कितने ही रह गए बाक़ी
आप 'शेखर' ग़ज़ल सुनाते हैं
Read Full