दहल जाता है दिल क्यूँँ आइने से
कभी पूछो किसी बहरूपिए से
हुआ इंसाफ़ गर इस फ़ैसले से
तो फिर क्यूँँ आह उट्ठी कटघरे से
किताबों से नहीं जो भूल जाऊँ
जो कुछ सीखा है सीखा तजरबे से
समंदर रोक पाएगा कहाँ तक
किसी टूटे हुए को डूबने से
निशाँ है प्यार का या सतवतों का
ये कैसी बू है आती मक़बरे से
अज़ीज़ों से मिला धोका तो जाना
खिसकती है ज़मीं पैरों तले से
हमेशा दौड़ कर मुमकिन नहीं है
कि मिलती भी है मंज़िल रेंगने से
शिकायत क्या करें अब फ़ासलों की
हमीं कहने गए थे तीसरे से
किसी के पाँव या लब तुम बताओ
ये रूखे होंठ हैं क्या चूमने से
सफ़र कोई नया थोड़ी है यारो
ये ग़म मुझ
में है सन चौरान्वे से
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