ख़ुद को न 'इश्क़ करने से रोके तो अब मरो
चाही थी ज़िंदगी ये तुम्हीं ने तो अब मरो
तुमको तो चीख़ना था कि तुम बे-क़ुसूर हो
अपने ही हक़ में बोल न पाए तो अब मरो
सब कह रहे हैं 'इश्क़ में हारे हुए हो तुम
रहने दो जीना बाद में पहले तो अब मरो
मैंने कहा था अपनी ये सच्चाई फूँक दो
जाओ अगर न बन सके झूठे तो अब मरो
सारा जहाँ भी हक़ में तुम्हारे हो अब भले
जब की न हक़ बयानी उसी ने तो अब मरो
रह जाएगा ये दीद-ए-असद ख़्वाब ही ‘सफ़र’
‘ग़ालिब’ के दौर में जो न जन्में तो अब मरो
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