"इज़हार"

जब मैं तुम से अपनी मोहब्बत का
इज़हार कर रहा था
तब मैं ये बिल्कुल भी नहीं
सोच पा रहा था
कि
अगर तुम हाँ कहोगी तो
जो हाँ मैं चाहता हूँ क्या
तुम वही हाँ कहोगी

या ना भी कहने लगी तो
उस ना में क्या
ज़रा सी हाँ भी होगी?

या जैसे तुम ने
इस तअल्लुक़ को आगे बढ़ाते हुए
मेरी तरफ़ दोस्ती का हाथ बढ़ा कर कहा
"हम दोस्त भी तो रह सकते हैं"

मगर इन सब बातों सें परे
उस दौरान मेरे ज़ेहन में
फ़क़त यही एक बात चल रही थी
कि क्या होगा
ज़िंदगी कि कोई नई शुरुआत होगी
या आज सब कुछ ख़त्म हो जाएगा

— Sandeep Rajput

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