हमें तो कह दिया है अजनबी हो
तुम अपने अपनों को तो जानती हो
हवा रह रह के जैसे हर दफा बस
हमारी ही पतंगे काटती हो
फिर अपने और पराये सब बराबर
अगर माधव के जैसा सारथी हो
कभी तुम आरज़ू में थे हमारी
अभी बस इक ख़याल-ए-आरज़ी हो
तुम्हें वो खुश रखे बस, ये दुआ है
गले में धागा जिसका बांध ली हो
हमें ऐसी घड़ी दो कोई जिस
में
सुई पहिये के जैसे भागती हो
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