कहाँ ये इल्म था दूर और दूर जाओगी

मैं तो ये सोच के चुप था कि लौट आओगी

ये बात धुन की तरह बज रही है कानों में
बदन का क़ुर्ब किसी और से निभाओगी

हर एक ईंट पुकारेगी मेरे घर की तुम्हें
तुम इस को तोड़ के जब घर नया बनाओगी

हम एक काँच के टूटे हुए दो टुकड़े हैं
किसी के साथ सही ढब से जुड़ न पाओगी

हुई थी प्यार में पैदा ख़याली लड़की जो
कहे है माँ मुझे चलना नहीं सिखाओगी

धुआँ लगेगा तुम्हारे भी दिल की आँखों को
तुम आग दिल की मेरे जब कभी बुझाओगी

— Vishnu virat

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Ilm Shayari

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