कुछ अभी कहना ला-शऊरी है
कुछ तो कहना मगर ज़रूरी है
कैसी यारी है यार अपनी भी
पास होते हुए भी दूरी है
ज़िंदगी तुझ से ही मुकम्मल है
ज़िंदगी बिन तेरे अधूरी है
तख़्त पाया है शे'र से लड़ कर
और वो शे'र शाह सूरी है
बा-ख़बर हो के ये हुआ मालूम
बे-ख़बर रहना भी ज़रूरी है
मौला लख़्त-ए-जिगर अता कर दे
तेरी रहमत बहुत ज़रूरी है
— Waseem Siddharthnagari















