मैं ने क्यूँ की ये मोहब्बत
मैं ने क्यूँ की ये मोहब्बत
तुम ने क्यूँ की ये मोहब्बत
क्यूँ किए हम ने वो वादे
क्यूँ वो क़स
में हम ने खाईं
क्यूँ गए हम उस जगह पर
क्यूँ बनाईं हम ने यादें
नाम क्यूँ लिख आए अपना पेड़ पर हम
क्यूँ निशानी पेड़ पर हम छोड़ आए
क्यूँ उसे तकलीफ़ों का हिस्सा बनाया
हम ने क्यूँ ख़्वाबों का गुलदस्ता सजाया
बेंच पर क्यूँ हम ने वो लम्हे गुज़ारे
मैं ने आख़िर क्यूँ तेरे गेसू सँवारे
क्यूँ रखा सिर मैं ने तेरी गोद में क्यूँ
बोझ क्यूँ तुम ने उतारा मेरे सिर का
मैं ने क्यूँ पकड़ी तुम्हारी वो कलाई
क्यूँ तुम्हारे हाथ चू
में
क्यूँ गले तुम को लगाया
क्यूँ जताया प्यार हम ने
क्यूँ क़रीब आए हम ऐसे
क्यूँ बसा आए वो दुनिया हम वहाँ पर
जब पता ही था उजड़ना होगा इस को
जब पता ही था बिछड़ना होगा हम को
क्यूँ न सोची हम ने ये बात
क्या फ़क़त दिल मिलने से रिश्ते हुए हैं
जी नहीं ये तो हमारी भूल है बस
कौन सुनता है दिलों की बात साहब
बस किए जाते हैं सौदे सिर्फ़ सौदे
बस ख़रीदे बेचे जाते हैं ये रिश्ते
ज़ात रुतबा हैसियत को देख कर के
मैं इन्हें रिश्ते नहीं कहता ये तो बस
ये तो बस समझौता है इक दूसरे से
जिस
में हम को ज़िंदगी भर घुटना है बस
ख़ैर इस
में कुछ नया भी तो नहीं है
इश्क़ में ऐसा ही तो होता रहा है
और होता ही रहेगा
ये मोहब्बत यूँ ही बस मरती रहेगी
और हम यूँ ही मनाएँगे ये मातम
सिर्फ़ मातम ज़िंदगी भर सिर्फ़ मातम















