है तिरा जिस्म आफ़्ताबी और क्या कुछ भी नहीं
शाम होते फिर शराबी और क्या कुछ भी नहीं
डाइरी के सब नज़ारे स्याहियों से धुल गए
रह गई बातें किताबी और क्या कुछ भी नहीं
आसमाँ कोशिश करेगा धरती पाने के लिए
बा'द निकलेगा सराबी और क्या कुछ भी नहीं
जो भी कुछ हम ने कमाया ज़िंदगी को लाँघ कर
वक़्त बैठा है हिसाबी और क्या कुछ भी नहीं
जो किया सब ठीक है जाना है सब को ही वहाँ
रहना है सब को जवाबी और क्या कुछ भी नहीं
— Yaduvanshi Abhishek















