Prince
Prince
Ghazal

मंज़िल ही जब सराब हो जाए तो क्या करें

हर आरज़ू अज़ाब हो जाए तो क्या करें

कुछ दिन अगरचे हिज्र में गुज़रें तो ख़ैर है
हर पल ही इज़तिराब हो जाए तो क्या करें

ये ज़ख़्म हम को काँटों से मिलते तो ठीक था
ज़ालिम ही जब गुलाब हो जाए तो क्या करें

हर क़ैदी चाहता है रिहाई मिले उसे
पर क़ैद इंतिखाब हो जाए तो क्या करें

मुद्दत के बा'द आया हो महबूब सपने में
और नींद गर ख़राब हो जाए तो क्या करें

जिस के लिए की कत'अ सितारों से दोस्ती
दुश्मन वो माहताब हो जाए तो क्या करें

जिस के सहारे मैं ने किनारे पे जाना था
वो तिनका गर्क-ए-आब हो जाए तो क्या करें

मालूम था जवाब जिसे हर सवाल का
वो प्रिंस लाजवाब हो जाए तो क्या करें

— Prince

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