मंज़िल ही जब सराब हो जाये तो क्या करें
हर आरज़ू 'अज़ाब हो जाये तो क्या करें
कुछ दिन अगरचे हिज्र में गुज़रें तो ख़ैर है
हर पल ही इज़तिराब हो जाये तो क्या करें
ये ज़ख़्म हमको काँटों से मिलते तो ठीक था
ज़ालिम ही जब गुलाब हो जाये तो क्या करें
हर कैदी चाहता है रिहाई मिले उसे
पर क़ैद इंतिखाब हो जाये तो क्या करें
मुद्दत के बाद आया हो महबूब सपने में
और नींद गर ख़राब हो जाये तो क्या करें
जिसके लिए की कत'अ सितारों से दोस्ती
दुश्मन वो माहताब हो जाये तो क्या करें
जिसके सहारे मैंने किनारे पे जाना था
वो तिनका गर्क-ए-आब हो जाये तो क्या करें
मालूम था जवाब जिसे हर सवाल का
वो प्रिंस लाजवाब हो जाये तो क्या करें
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