घाव मेरे हरा करे कोईक्यूँ तुम्हें बद-दुआ करे कोईकैसे कैसों के हाथ आई हैइश्क़ तेरा भला करे कोईबे-कली ख़त्म होती जाती हैज़ख़्म को फिर हवा करे कोईशर्त है क़त्ल हो मेरा और येकाम भी बे-वफ़ा करे कोईरूह छालों से भर गई हो जबज़ख़्म से ही सजा करे कोई— Aatish Alok