"अलामत-ए-इश्क़"
दबी दबी सी हँसी पे थी होंठो की जुंबिश
या थरथराते लबों पे खिला तबस्सुम था
गुदाज़ सुर्ख़ शफ़क़ ज़र्द-पोश गुल-दोज़ी
कभी कभी तो लगे इश्क़ की अलामत है
झुकी झुकी सी नज़र से ये दिल चुराना था
या शर्म से यूँ निगाहें ज़रा तग़ाफ़ुल थे
नज़र मिलाना भी तेरा नज़र चुराना भी
कभी कभी तो लगे इश्क़ की अलामत है
तुनुक-मिज़ाज सी साँसें ख़फ़ा ख़फ़ा हो के
ये ख़त भी पढ़ रहे होंगे तुनुक-मिज़ाजी में
तो क्या कहोगे अगर मैं कहूँ कि अब मुझ को
कभी कभी तो लगे हाँ यही मुहब्बत है
— Vishnu Dope














