अंगूरी बदन आतिश यौवन ज़ुल्फ़ों की झलक फिर वैसी ही
चलने का हुनर नायाब तिरा फ़ित्ने की चमक फिर वैसी ही
रुख़सार तिरा है मौज-ए-बला और होंट तिरे सूरज की किरन
जोशीला बदन आफ़त चितवन ऊपर से फुदक फिर वैसी ही
वो पहली दफ़ा जब तुम से मिले तुम ख़ूब लिपट के रोए थे
अब शहर से हैं जाने को मगर होंटों पे सिसक फिर वैसी ही
पाताल से ढूँढ़ निकालेगा जो हम ने छोड़ा शहर तिरा
हम भूले नहीं ग़ुस्सा तेरा आँखों में खटक फिर वैसी ही
खेतों की कगर पर बैठ के हम चीज़ इक दूजे को खिलाते थे
हम आज बिछड़ने को हैं मगर होंटों पे गज़क फिर वैसी ही
क्या हाल बनाया है ऐसा सदियों से जैसे देखा न हो
मैं सामने रोज़ आता हूँ मगर आँखों में कसक फिर वैसी ही
वो रात सितारों वाली हो गालों पर तेरे लाली हो
सर जाँघ पे तेरी रक्खा हो सीने की लपक फिर वैसी ही















