"सदा-ए-मुफ़लिस"

मैं देने के लाएक़ नहीं कुछ किसी को सो अपने बदन की क़बा दे रहा हूँ
मुझे भी तो देते हुए शर्म आती है परियों की रानी को क्या दे रहा हूँ
मुझे भी तो देते हुए शर्म आती है परियों की रानी को क्या दे रहा हूँ

मिरी ज़िंदगी की दुआ करने वालों तुम्हें आख़िरी मैं दुआ दे रहा हूँ
मुबारक हो सब को ख़ुशी का ठिकाना ये महफ़िल ख़ुशी की तुम्हें दे रहा हूँ
मिरे पास खाने को कुछ भी नहीं है सभी के लिए ये जवा दे रहा हूँ
मुझे भी तो देते हुए शर्म आती है परियों की रानी को क्या दे रहा हूँ

अरे मत करो कोई एहसान मुझ पर उतारूँगा कैसे ये एहसान लोगों
मुझे उम्र-भर गालियाँ दोगे फिर सब हमेशा रहोगे परेशान लोगों
ज़रूरत नहीं कुछ भी देने की मुझ को मैं तुम को तुम्हारी वफ़ा दे रहा हूँ
मुझे भी तो देते हुए शर्म आती है परियों की रानी को क्या दे रहा हूँ

मुझे कोई ख़ुश रहने की मत दुआ दो ये ग़म ही मिरी ज़िंदगी बन गया है
मुझे दर्द-ए-दिल ही सभी लोग देना यही तो मिरी बंदगी बन गया है
मिरी ज़िंदगी आग का एक गोला है ऐसे में तुझ को हवा दे रहा हूँ
मुझे भी तो देते हुए शर्म आती है परियों की रानी को क्या दे रहा हूँ

कभी तो मिलेगी मुझे मेरी मंज़िल यही सोच कर के चला जा रहा हूँ
मुझे कुछ न लेना न देना किसी से ज़माने में सब से मैं तन्हा रहा हूँ
मैं दुश्मन हूँ सबका मगर देख फिर भी सभी के लिए दिल में जा दे रहा हूँ
मुझे भी तो देते हुए शर्म आती है परियों की रानी को क्या दे रहा हूँ

कोई ये न कहना कभी उन से जा कर कि ज़ख़्मों को कैसे मैं अब सी रहा हूँ
अगर हाल मेरा कोई तुम से पूछे तो कहना यही पी के मैं जी रहा हूँ
अब इस से ज़ियादा नहीं देने को कुछ तुम्हें अपना रंग-ए-नशा दे रहा हूँ
मुझे भी तो देते हुए शर्म आती है परियों की रानी को क्या दे रहा हूँ

ये दिल की सदा है इसे दिल से सुनना कहीं भी न फिर ये दुबारा मिलेगी
मिरी ज़िंदगी मुफ़लिसी में कटी है इसी में कटेगी इसी में कटेगी
मिरे हाल पर कोई रोना नहीं मैं बस ऐसे ही ख़ुद को सज़ा दे रहा हूँ
मुझे भी तो देते हुए शर्म आती है परियों की रानी को क्या दे रहा हूँ

मिरे पास जाँ के सिवा कुछ नहीं है जिसे दे रहा हूँ यही दे रहा हूँ
मैं सब जानता हूँ मुझे मत सिखाओ मैं जो दे रहा हूँ सही दे रहा हूँ
अमीरों की औक़ात के जो है बाहर फ़क़ीरों को मैं वो अता दे रहा हूँ
मुझे भी तो देते हुए शर्म आती है परियों की रानी को क्या दे रहा हूँ

— Prashant Kumar

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