अब नहीं लगता इबादत में कहीं दिल अपना
रो रहा है तेरी चाहत में कहीं दिल अपना
घर से निकले थे बड़े ख़्वाब लिए आँखों में
हार बैठे हैं मुहब्बत में कहीं दिल अपना
इस लिए भी मैं शराफ़त से जुदा हूँ शायद
टूट जाए न शराफ़त में कहीं दिल अपना
हम ने रस्मन ही अँगूठे तो लगाए लेकिन
लग अगर जाता वसीयत में कहीं दिल अपना
गर तेरा सच न पता होता चला जाता मैं
छोड़कर तेरी हिफ़ाज़त में कहीं दिल अपना
— Adesh Rathore















