अब ज़रूरत नहीं बिछौने की
हम को आदत है नीचे सोने की
क्या सितम है कि दिल के पिंजरे में
एक चिड़िया है वो भी सोने की
अब कोई डर नहीं अँधेरों का
अब कोई शय नहीं है खोने की
यूँॅं ही रोते हो बे-सबब या फिर
है कोई ख़ास वज्ह रोने की
इश्क़ भी महॅंगी चीज़ है 'आदेश'
हम ग़रीबों से अब न होने की
— Adesh Rathore















