तभी तो मैं मोहब्बत का हवालाती नहीं होता

यहाँ अपने सिवा कोई मुलाक़ाती नहीं होता

गिरफ़्तार-ए-वफ़ा रोने का कोई एक मौसम रख
जो नाला रोज़ बह निकले वो बरसाती नहीं होता

बिछड़ने का इरादा है तो मुझ से मशवरा कर लो
मोहब्बत में कोई भी फ़ैसला ज़ाती नहीं होता

तुम्हें दिल में जगह दी थी नज़र से दूर क्या करते
जो मरकज़ में ठहर जाए मज़ाफ़ाती नहीं होता

— Afzal Khan

More by Afzal Khan

Other ghazal from the same pen

See all from Afzal Khan →

Ummeed Shayari

Shers of ummeed.

All Ummeed Shayari poetry →

Similar writers

Voices in the same orbit

Browse by mood

Poetry by feeling