aane lagii jab relgaa | आने लगी जब रेलगाड़ी खड़खड़ाईं पटरियाँ

  - Afzal Sultanpuri

आने लगी जब रेलगाड़ी खड़खड़ाईं पटरियाँ
मैं देर से समझा मोहब्बत ले रही थी सिसकियाँ

अंदाज़ उम्दा हुस्न ज़ालिम क़ाबिल-ए-तारीफ़ था
थीं फूल पर बैठी हुई जैसे नई कुछ तितलियाँ

क्या ही बताऊँ मैं तुम्हें किस बात से नाराज़ थी
मैं एक दिन छत पर गया तो बंद कर दीं खिड़कियाँ

हर ज़ख़्म दिल का चीख़कर देता रहा बस बद-दुआ
ये ज़िंदगी भी कह रही थी आख़िरी हैं हिचकियाँ

जब ये इरादा कर लिया जाना नहीं अब लौट कर
फिर साहिलों पर जो भी थीं हमने जला दीं कश्तियाँ

मुद्दत हुई आए उन्हें हम राह तकते थक गए
किस काम में मसरूफ़ हैं मिलती नहीं क्या छुट्टियाँ

हैं चार बेटे यूँँ तो मेरे साथ में कोई नहीं
करतीं मुनव्वर घर हमारा ये फ़क़त दो बेटियाँ

  - Afzal Sultanpuri

Ghayal Shayari

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