आम है कूचा-ओ-बाज़ार में सरकार की बात

अब सर-ए-राह भी होती है सर-ए-दार की बात

हम जो करते हैं कहीं मिस्र के बाज़ार की बात
लोग पा लेते हैं यूसुफ़ के ख़रीदार की बात

मुद्दतों लब पे रही नर्गिस-ए-बीमार की बात
कीजिए अहल-ए-चमन अब ख़लिश-ए-ख़ार की बात

ग़ुंचे दिल-तंग हवा बंद नशेमन वीराँ
बाइस-ए-मर्ग है मेरे लिए ग़म-ख़्वार की बात

बू-ए-गुल ले के सबा कुंज-ए-क़फ़स तक पहुँची
लाख पर्दों में भी फैली शब-ए-गुलज़ार की बात

ज़िंदगी दर्द में डूबी हुई लय है 'राही'
ऐसे आलम में किसे याद रहे प्यार की बात

— Ahmad Rahi

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