आप इतना भी तक़ल्लुफ़ न उठाया कीजे
ज़ुल्म करना हो तो फिर हमको बुलाया कीजे
मुझको आता नहीं नज़रों की लिखावट पढ़ना
इक गुज़ारिश है मुझे आप सिखाया कीजे
चैन से किसने दिवानों को दिया है मिलने
आप मिलने को बहाना भी बनाया कीजे
कोई और रस्म अदा कर लें जुदा होने की
यूँँंँ गले लगके तो ना हमको पराया कीजे
ये समझने के लिए 'उम्र लगी है अहमद
जो भुला दे तो उसे याद न आया कीजे
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