ik nazar karke idhar raat karne vaala tha | इक नज़र करके इधर रात करने वाला था

  - Faiz Ahmad

इक नज़र करके इधर रात करने वाला था
वो ख़ुसूसी शख़्स जब बात करने वाला था

वो उधर तय्यार थी तर्क ए उल्फ़त के लिए
और इधर मैं शादी की बात करने वाला था

थी बहुत उसको ग़लतफ़हमियां लेकर मुझे
संग मैं जिसके दूर शुबहात करने वाला था

उस ख़ुदा ने तुझको लेके मिरा सब ले लिया
मैं इबादत जिसकी दिन रात करने वाला था

उसने उस दिन छोड़ा था मुझको के जिस रोज़ मैं
माँ से उसके लिए बात करने वाला था

ख़ुद पे वहशत मैंने कुछ इतनी तारी करली थी
देखकर सामित भी अस्वात करने वाला था

उसने इक लड़के से उस वक़्त मिलवाया मुझे
मैं बयाँ जब एहसासात करने वाला था

ख़ुश था उस सेे मिलने को पर मुझे मालूम था
आख़िरी बारी मुलाक़ात करने वाला था

जाने क्यूँँ अब लग रहा है मोहब्बत से मुझे
था कोई जो मुझको मोहतात करने वाला था

जा चुका था वरना हैं ये ग़ज़ल किसके लिए
'फ़ैज़' से वो ये सवालात करने वाला था

  - Faiz Ahmad

Mohabbat Shayari

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