kahooñ tujhe likhoon tujhe padhoon tujhe | कहूँ तुझे लिखूँ तुझे पढ़ूँ तुझे

  - Faiz Ahmad

कहूँ तुझे लिखूँ तुझे पढ़ूँ तुझे
इक अक्स बनके सामने सुनूँ तुझे

रहेगी तू हमेशा दिल के पास ही
मैं चाहे कितना भी गलत लिखूँ तुझे

तू पूछे जब कि तुझ सेे क्या है राब्ता
तो मैं, तू प्यार है मिरा कहूँ तुझे

ख़ुदा की मुझपे नेमतों को गर गिनूँ
तो सब सेे 'आला दर्जे पे गिनूँ तुझे

मैं आया वैसे तो हूँ दिल को बेचने
मगर ये दिल की शर्त है बिकूँ तुझे

मिरे दरूँ तू घुल मिले कुछ इस तरह
हर इक मैं अपनी साँस में ज्यूँँ तुझे

मैं बन सकूँ तिरी निगाहों की तलब
जहाँ भी देखे हर तरफ दिखूँ तुझे

  - Faiz Ahmad

Ijazat Shayari

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