माह-ए-कामिल हो आसमाँ हो तुम
शाहज़ादी मिरा जहाँ हो तुम
जिस जगह दिल में तुम को रक्खा था
जान-ए-जाँ आज भी वहाँ हो तुम
अन-सुना एक वाक़िया हूँ मैं
अन-कही एक दास्ताँ हो तुम
— Faiz Ahmad
शाहज़ादी मिरा जहाँ हो तुम
जिस जगह दिल में तुम को रक्खा था
जान-ए-जाँ आज भी वहाँ हो तुम
अन-सुना एक वाक़िया हूँ मैं
अन-कही एक दास्ताँ हो तुम
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