apni pahchaan bhi ab tumse karau'n main bhi | अपनी पहचान भी अब तुम सेे कराऊँ मैं भी

  - Faiz Ahmad

अपनी पहचान भी अब तुम सेे कराऊँ मैं भी
दिल की हर बात को क्यूँँं तुम सेे बताऊँ मैं भी

तू जो रुसवा करे जाता है ज़माने में मुझे
तेरी ख़ातिर जो लगे ज़ख़्म दिखाऊँ मैं भी

वैसे तो राज़ हूँ इक पर है ये ख़्वाहिश मेरी
जाने तू मुझ सेे तो सब राज़ बताऊँ मैं भी

तेरी महफ़िल में खटकती है कमी शायर की
दे इजाज़त कि तिरी बज़्म में आऊँ मैं भी

क्या हुआ है तिरे जाने से मिरे दिल का हाल
तू अगर पूछे जो दिल से तो सुनाऊँ मैं भी

हर कोई तुझको सुनाए चला जाता है यहाँ
है तमन्ना के ग़ज़ल तुझको सुनाऊँ मैं भी

ये सियासत की रिवायत है तो होती होगी
क्या अब इस दुनिया को आपस में लड़ाऊँ मैं भी

तुमने मुँह फेर लिया मेरी मोहब्बत से तो ठीक
पर ये न हुक्म करो तुमको भुलाऊँ मैं भी

है तो काफ़ी ही नज़र उसकी नशे के लिए पर
वो इशारा जो करे जाम उठाऊँ मैं भी

ये ज़रूरी नहीं उसको भी मोहब्बत हो 'फ़ैज़'
सब मिरे साथ हुआ है ये बताऊँ मैं भी

  - Faiz Ahmad

Baaten Shayari

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