कुल आलम-ए-वुजूद कि इक दश्त-ए-नूर था

सारा हिजाब तीरा-दिली का क़ुसूर था

समझे थे जोहद-ए-इश्क़ में हम सुर्ख़-रू हुए
देखा मगर तो शीशा-ए-दिल चूर चूर था

पहुँचे न यूँ ही मंज़िल-ए-इज़हार-ए-ज़ात तक
तहत-ए-शुऊर इक सफ़र-ए-ला-शुऊर था

था जो क़रीब उस को बसीरत न थी नसीब
जो देखता था मुझ को बहुत मुझ से दूर था

मुबहम थे सब नुक़ूश नक़ाबों की धुँद में
चेहरा इक और भी पस-ए-चेहरा ज़रूर था

— Akbar Hyderabadi

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