mohabbaton men bahut ras bhi hai mithaas bhi hai | मोहब्बतों में बहुत रस भी है मिठास भी है

  - Akhtar Amaan

मोहब्बतों में बहुत रस भी है मिठास भी है
हमारे जीने की बस इक यही असास भी है

कभी तो क़ुर्ब से भी फ़ासले नहीं मिटते
गो एक 'उम्र से वो शख़्स मेरे पास भी है

किसी के आने का मौसम किसी के जाने का
ये दिल कि ख़ुश भी है लेकिन बहुत उदास भी है

बदन के शहर में आबाद इक दरिंदा है
अगरचे देखने में कितना ख़ुश-लिबास भी है

ये जानते हैं कि सब थक के गिर पड़ेंगे कहीं
शिकस्ता लोगों में जीने की कितनी आस भी है

वो उस का अपना ही अंदाज़ है बयाँ का 'अमान'
हर एक हुक्म पे कहता है इल्तिमास भी है

  - Akhtar Amaan

Bekhayali Shayari

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