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नाले मिरे जब तक मिरे काम आते रहेंगे  - Akhtar Muslimi

नाले मिरे जब तक मिरे काम आते रहेंगे
ऐ ज़ौक़-ए-नज़र वो लब-ए-बाम आते रहेंगे

ऐ ज़ौक़-ए-तलब तू जो सलामत है तो क्या ग़म
लब तक मिरे ख़ुद जाम पे जाम आते रहेंगे

दिल ज़िंदा अगर हो तो फिर ऐ ज़ीस्त के तालिब
हर गाम पे जीने के पयाम आते रहेंगे

मंज़िल की तमन्ना है तो ठुकरा के निकल जा
सय्याद लिए दाना-ओ-दाम आते रहेंगे

खा जाओ न धोका कहीं मंज़िल के गुमाँ पर
रस्ते में कुछ ऐसे भी मक़ाम आते रहेंगे

'अख़्तर' अगर आबाद रहे गुल-कदा-ए-दिल!
फिर इस में तो कुछ मस्त ख़िराम आते रहेंगे

- Akhtar Muslimi

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