Akhtar Muslimi

Akhtar Muslimi

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Akhtar Muslimi shayari collection includes sher, ghazal and nazm available in Hindi and English. Dive in Akhtar Muslimi's shayari and don't forget to save your favorite ones.

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  • Ghazal
मिरे वास्ते जहाँ में कोई दिलकशी नहीं है
कि तिरे बग़ैर जीना कोई ज़िंदगी नहीं है

तिरी ज़ात के अलावा मुझे और चाहिए क्या
तू अगर है साथ मेरे मुझे कुछ कमी नहीं है

वो नज़र नज़र नहीं है न हो जिस में अक्स तेरा
कोई दिल है वो भी जिस में ग़म-ए-आशिक़ी नहीं है

कोई वास्ता नहीं है जिसे दर्द-ए-दीगराँ से
वो है आदमी का पैकर मगर आदमी नहीं है

मिरे दोस्तो न देखो मुझे चश्म-ए-ख़शमगीं से
कि रहीन-ए-बादा-नोशी मिरी बे-ख़ुदी नहीं है

मिरे दिल के दाग़ तू ही ज़रा और लौ बढ़ा दे
शब-ए-ग़म है तीरा तीरा कहीं रौशनी नहीं है

मिरी बात सुन के 'अख़्तर' सुनी अन-सुनी न कर दो
ये हदीस-ए-जान-ओ-दिल हे निरी शाइ'री नहीं है
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Akhtar Muslimi
किस को कहते हैं जफ़ा क्या है वफ़ा याद नहीं
ऐ मोहब्बत मुझे कुछ तेरे सिवा याद नहीं

देखिए होती है किस तरह शब-ए-ग़म की सहर
अब तो ऐ दर्द-ए-जिगर कोई दुआ याद नहीं

हो गई ख़त्म रह-ओ-रस्म-ए-मोहब्बत शायद
मैं वफ़ा भूल गया उन को जफ़ा याद नहीं

यूँ भी कर सकते हो बर्बाद-ए-मोहब्बत पे करम
हम ने माना कि तुम्हें अहद-ए-वफ़ा याद नहीं

दिल-ए-दीवाना पे इल्ज़ाम लगाने वाले
जिस ने दीवाना बनाया वो अदा याद नहीं

जिस से 'अख़्तर' हो मिरे दर्द-ए-मोहब्बत का इलाज
क्या मसीहा-नफ़सों को वो दवा याद नहीं
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Akhtar Muslimi
कहाँ जाएँ छोड़ के हम उसे कोई और उस के सिवा भी है
वही दर्द-ए-दिल भी है दोस्तो वही दर्द-ए-दिल की दवा भी है

मिरी कश्ती लाख भँवर में है न करूँगा मैं तिरी मिन्नतें
ये पता नहीं तुझे नाख़ुदा मिरे साथ मेरा ख़ुदा भी है

ये अदा भी उस की अजीब है कि बढ़ा के हौसला-ए-नज़र
मुझे इज़्न-ए-दीद दिया भी है मिरे देखने पे ख़फ़ा भी है

मिरी सम्त महफ़िल-ए-ग़ैर में वो अदा-ए-नाज़ से देखना
जो ख़ता-ए-इश्क़ की है सज़ा तो मिरी वफ़ा का सिला भी है

जो हुजूम-ए-ग़म से है आँख नम तो लबों पे नाले हैं दम-ब-दम
उसे किस तरह से छुपाएँ हम कहीं राज़-ए-इश्क़ छुपा भी है

ये बजा कि 'अख़्तर'-ए-मुस्लिमी है ज़माने भर से बुरा मगर
उसे देखिए जो ख़ुलूस से तो भलों में एक भला भी है
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Akhtar Muslimi
दिल ही रह-ए-तलब में न खोना पड़ा मुझे
हाथ अपनी ज़िंदगी से भी धोना पड़ा मुझे

इक दिन में हँस पड़ा था किसी के ख़याल में
ता-उम्र इतनी बात पे रोना पड़ा मुझे

इक बार उन को पाने की दिल में थी आरज़ू
सौ बार अपने आप को खोना पड़ा मुझे

बर्बाद हो गया हूँ मगर मुतमइन है दिल
शर्मिंदा-ए-करम तो न होना पड़ा मुझे

देखी गई न मुझ से जो तूफ़ाँ की बेबसी
कश्ती को अपनी आप डुबोना पड़ा मुझे

जल्वे कहाँ किसी के बिसात-ए-नज़र कहाँ
ज़र्रे में आफ़्ताब समोना पड़ा मुझे

'अख़्तर' जुनून-ए-इश्क़ के मारों को देख कर
अहल-ए-ख़िरद हँसे हैं तो रोना पड़ा मुझे
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Akhtar Muslimi
न समझ सकी जो दुनिया ये ज़बान-ए-बे-ज़बानी
तिरा चेहरा ख़ुद कहेगा मिरे क़त्ल की कहानी

ये अज़ाब-ए-आसमानी ये इताब-ए-ना-गहानी
हैं कहाँ समझने वाले मिरे आँसुओं को पानी

कहीं लुट रहा है ख़िर्मन कहीं जल रहा है गुलशन
उसे किस ने सौंप दी है ये चमन की पासबानी

मिरी तुझ से क्या है निस्बत मिरा तुझ से वास्ता क्या
तू हरीस-ए-लाला-ओ-गुल मैं फ़िदा-ए-बाग़बानी

तुझे नाज़ हुस्न पर है मुझे नाज़ इश्क़ पर है
तिरा हुस्न चंद-रोज़ा मिरा इश्क़ जावेदानी

ये वो दिल-रुबा है दुनिया मिरे दोस्तो कि जिस की
न कोई अदा नई है न कोई अदा पुरानी

कोई उस से कह दे 'अख़्तर' ज़रा होश में वो आए
न रहेगा ज़िंदगी भर ये सुरूर-ए-शादमानी
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Akhtar Muslimi
दरिया नज़र न आए न सहरा दिखाई दे
जोश-ए-जुनूँ हो जिस को उसे क्या दिखाई दे

मैं आ गया कहाँ कि ये हसरत नज़र को है
ऐ काश इस जगह कोई अपना दिखाई दे

ख़ंदाँ-जबीं लबों पे हँसी पुर-ख़ुलूस दिल
दौर-ए-तरब में कोई तो ऐसा दिखाई दे

ख़्वाहाँ हैं वो कि सारा ज़माना हो उन के साथ
औरों को चाहते हैं कि तन्हा दिखाई दे

'अख़्तर' को देखते नहीं अच्छी नज़र से आप
फिर भी ये चाहते हैं कि अच्छा दिखाई दे
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Akhtar Muslimi
तुम अपनी ज़बाँ ख़ाली कर के ऐ नुक्ता-वरो पछताओगे
मैं ख़ूब समझता हूँ उस को जो बात मुझे समझाओगे

इक मैं ही नहीं हूँ तुम जिस को झूटा कह कर बच जाओगे
दुनिया तुम्हें क़ातिल कहती है किस को किस को झुटलाओगे

या राहत-ए-दिल बन कर आओ या आफ़त-ए-दिल बन कर आओ!
पहचान ही लूँगा मैं तुम को जिस भेस में भी तुम आओगे

हर बात बिसात-ए-आलम में मानिंद-ए-सदा-ए-गुम्बद है
औरों को बुरा कहने वालो तुम ख़ुद भी बुरे कहलाओगे

फिर चैन न पाओगे 'अख़्तर' इस दर्द की मारी दुनिया में
इस दर से अगर उठ जाओगे दर, दर की ठोकर खाओगे
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Akhtar Muslimi
शिकवा इस का तो नहीं है जो करम छोड़ दिया
है सितम ये कि सितमगर ने सितम छोड़ दिया

ले गया छीन कोई सब सर-ओ-सामान-ए-हयात
हाँ मगर एक सुलगता हुआ ग़म छोड़ दिया

लग गई इन को भी शायद तिरे कूचे की हवा
मय-कदा रिंद ने ज़ाहिद ने हरम छोड़ दिया

हाए उस रह-रव-ए-बर्बाद की मंज़िल ऐ दोस्त
जिस ने घबरा के तिरा नक़्श-ए-क़दम छोड़ दिया
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Akhtar Muslimi
माइल-ए-लुत्फ़ है आमादा-ए-बे-दाद भी है
वो सरापा-ए-मोहब्बत सितम-ईजाद भी है

शब-ए-तन्हाई भी है साथ तिरी याद भी है
दिल का क्या हाल कहूँ शाद भी नाशाद भी है

दौलत-ए-ग़म से हर इक गोशा है इस का मामूर
दिल की दुनिया मिरी आबाद भी बर्बाद भी है

बे-सबब तो नहीं एहसास ख़लिश का मुझ को
भूलने वाले तिरे दिल में मिरी याद भी है

क्यूँ न आसाँ हो रह-ए-इश्क़ कि मेरे हम-राह
जज़्बा-ए-'क़ैस' भी है हिम्मत-ए-'फ़रहाद' भी है

जल गया अपना नशेमन मगर अफ़सोस ये है
फूँकने वालों में इक बर्क़-ए-चमन-ज़ाद भी है

मेरा विज्दान मुहर्रिक है मिरे नग़्मों का
तब्-ए-मौज़ूँ मिरी पाबंद भी आज़ाद भी है

क्या बताऊँ मैं तुम्हें क्या है नवा-ए-'अख़्तर'
नग़्मे का नग़्मा है फ़रियाद की फ़रियाद भी है
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Akhtar Muslimi
आँसुओं के तूफ़ाँ में बिजलियाँ दबी रखना
सर्द सर्द आहों में गर्मियाँ दबी रखना

कैफ़ियत ग़म-ए-दिल की हो अयाँ न चेहरे से
पर्दा-ए-तबस्सुम में तल्ख़ियाँ दबी रखना

कौन सुनने वाला है बे-हिसों की दुनिया में
अपने ग़म की सीने में दास्ताँ दबी रखना

किस क़दर अनोखा है शेवा अहल-ए-दुनिया का
मीठी मीठी बातों में तल्ख़ियाँ दबी रखना

ख़ूब है तुम्हारा भी ये कमाल-ए-फ़न 'अख़्तर'
सादा सादा शेरों में शोख़ियाँ दबी रखना
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Akhtar Muslimi
नाले मिरे जब तक मिरे काम आते रहेंगे
ऐ ज़ौक़-ए-नज़र वो लब-ए-बाम आते रहेंगे

ऐ ज़ौक़-ए-तलब तू जो सलामत है तो क्या ग़म
लब तक मिरे ख़ुद जाम पे जाम आते रहेंगे

दिल ज़िंदा अगर हो तो फिर ऐ ज़ीस्त के तालिब
हर गाम पे जीने के पयाम आते रहेंगे

मंज़िल की तमन्ना है तो ठुकरा के निकल जा
सय्याद लिए दाना-ओ-दाम आते रहेंगे

खा जाओ न धोका कहीं मंज़िल के गुमाँ पर
रस्ते में कुछ ऐसे भी मक़ाम आते रहेंगे

'अख़्तर' अगर आबाद रहे गुल-कदा-ए-दिल!
फिर इस में तो कुछ मस्त ख़िराम आते रहेंगे
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Akhtar Muslimi