muddat se laapata hai KHuda jaane kya hua | मुद्दत से लापता है ख़ुदा जाने क्या हुआ

  - Akhtar Saeed Khan

मुद्दत से लापता है ख़ुदा जाने क्या हुआ
फिरता था एक शख़्स तुम्हें पूछता हुआ

वो ज़िंदगी थी आप थे या कोई ख़्वाब था
जो कुछ था एक लम्हे को बस सामना हुआ

हम ने तिरे बग़ैर भी जी कर दिखा दिया
अब ये सवाल क्या है कि फिर दिल का क्या हुआ

सो भी वो तू न देख सकी ऐ हवा-ए-दहर
सीने में इक चराग़ रखा था जला हुआ

दुनिया को ज़िद नुमाइश-ए-ज़ख़्म-ए-जिगर से थी
फ़रियाद मैं ने की न ज़माना ख़फ़ा हुआ

हर अंजुमन में ध्यान उसी अंजुमन का है
जागा हो जैसे ख़्वाब कोई देखता हुआ

शायद चमन में जी न लगे लौट आऊँ मैं
सय्याद रख क़फ़स का अभी दर खुला हुआ

ये इज़्तिराब-ए-शौक़ है 'अख़्तर' कि गुमरही
मैं अपने क़ाफ़िले से हूँ कोसों बढ़ा हुआ

  - Akhtar Saeed Khan

Dil Shayari

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