न आप आए न बेदाद-ए-इंतिज़ार गई
ये रात फिर मिरी आँखों से आज हार गई
लिए हुए कोई अफ़्साना-ए-बहार गई
सबा चमन से बहुत आज सोगवार गई
हुई जो सुब्ह तो अश्कों से जगमगा उट्ठी
जो आई शाम तो यादों से मुश्क-बार गई
इसी निगाह ने मारा अलम-परस्तों को
वही निगाह मिरी ज़िंदगी सँवार गई
ज़मीन-ए-कू-ए-मलामत भी ख़ैर राह में थी
कहाँ कहाँ लिए मौज-ए-ख़िराम-ए-यार गई
— Akhtar Saeed Khan















