यक़ीन है न गुमाँ है ज़रा सँभल के चलो

अजीब रंग-ए-जहाँ है ज़रा सँभल के चलो

सुलगते ख़्वाबों की बस्ती है रह-गुज़ार-ए-हयात
यहाँ धुआँ ही धुआँ है ज़रा सँभल के चलो

रविश रविश है गुज़र-गाह-ए-निकहत-ए-बर्बाद
कली कली निगराँ है ज़रा सँभल के चलो

जो ज़ख़्म दे के गई है अभी नसीम-ए-सहर
सुकूत-ए-गुल से अयाँ है ज़रा सँभल के चलो

ख़िराम-ए-नाज़ मुबारक तुम्हें मगर ये दिल
मता-ए-शीशा-गराँ है ज़रा सँभल के चलो

सुराग़-ए-हश्र न पा जाएँ देखने वाले
हुजूम-ए-दीदा-वराँ है ज़रा सँभल के चलो

यहाँ ज़मीन भी क़दमों के साथ चलती है
ये आलम-ए-गुज़राँ है ज़रा सँभल के चलो

— Akhtar Saeed Khan

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