जुदाई में तिरी आँखों को झील करते हुए
सुबूत ज़ाएअ'' किया है दलील करते हुए
मैं अपने आप से ख़ुश भी नहीं हूँ जाने क्यूँ
सो ख़ुश हूँ अपने ही रस्ते तवील करते हुए
न जाने याद उसे आया क्या अचानक ही
गले लगा लिया मुझ को ज़लील करते हुए
कहीं तिरी ही तरह हो गया न हो ये दिल
सो डर रहा हूँ अब उस को वकील करते हुए
थकन सफ़र की तो महसूस ही नहीं होती
चलूँ तुम्हें जो सर-ए-राह फ़ील करते हुए
— Aks samastipuri















