जितना हमारी ख़ाक को तू टटोलेगा
डाल के मिट्टी आँखें अपनी भिगोलेगा
जुगनू,चाँद पे अपनी धाक जमा लेगा
सूरज अब भी आँख अगरचे न खोलेगा
रस्ते में कोई ताल नहीं है महशर के
अच्छा है जो दाग यहीं से ही धोलेगा
कुछ तो यक़ीं से काम लिया कर ऐ इंसा
कितना ख़ुदा को वहमो गुमाँ में तोलेगा
बनता है हर काम किसी का किसी से तो
किस के मुखालिफ कौन यहाँ पर बोलेगा
तख़्लीक है मेरा ढांचा गीली मिट्टी से
आसाँ नहीं जो साथ हवा के होलेगा
सच्चाई है जिस के सुखन में थोड़ी अली
वो सामने एक आ कर मेरे मुँह पर बोलेगा
— Ali Mohammed Shaikh















