fitrat ko khird ke roo-b-roo kar | फ़ितरत को ख़िरद के रू-ब-रू कर

  - Allama Iqbal

फ़ितरत को ख़िरद के रू-ब-रू कर
तस्ख़ीर-ए-मक़ाम-ए-रंग-ओ-बू कर

तू अपनी ख़ुदी को खो चुका है
खोई हुई शय की जुस्तुजू कर

तारों की फ़ज़ा है बे-कराना
तू भी ये मक़ाम-ए-आरज़ू कर

उर्यां हैं तिरे चमन की हूरें
चाक-ए-गुल-ओ-लाला को रफ़ू कर

बे-ज़ौक़ नहीं अगरचे फ़ितरत
जो उस से न हो सका वो तू कर

  - Allama Iqbal

Attitude Shayari

Our suggestion based on your choice

    पा ए उम्मीद प रक्खे हुए सर हैं हम लोग
    हैं न होने के बराबर ही मगर हैं हम लोग

    तू ने बरता ही नहीं ठीक से हम को ऐ दोस्त
    ऐब लगते हैं बज़ाहिर प हुनर हैं हम लोग
    Read Full
    Abhishek shukla
    24 Likes
    बेवफ़ाई ने तिरी मुझको दिया है ये हुनर बस
    यार दुनिया में कहाँ हर भाग्य में ये फ़न लिखा है
    Harsh saxena
    गर अदीबों को अना का रोग लग जाये तो फिर
    गुल मोहब्बत के अदब की शाख़ पर खिलते नहीं
    Afzal Ali Afzal
    कहाँ हम ग़ज़ल का हुनर जानते हैं
    मगर इस ज़बाँ का असर जानते हैं

    ये वो हुस्न जिसको निखारा गया है
    नया कुछ नहीं हम ख़बर जानते हैं

    कि है जो क़फ़स में वो पंछी रिहा हो
    परिंदें ज़मीं के शजर जानते हैं

    फ़क़त रूह के नाम है इश्क़ लेकिन
    बदन के हवाले से घर जानते हैं

    फ़ुलाँ है फ़ुलाँ का यक़ीं हैं हमें भी
    सुनो हम उसे सर-ब-सर जानते हैं

    कि अब यूँ सिखाओ न रस्म-ए-सियासत
    झुकाना कहाँ है ये सर जानते हैं
    Read Full
    Neeraj Neer
    16 Likes
    अगर तुम्हारी अना ही का है सवाल तो फिर
    चलो मैं हाथ बढ़ाता हूँ दोस्ती के लिए
    Ahmad Faraz
    47 Likes
    बा-हुनर होके कुछ न कर पाना
    रेज़ा-रेज़ा बिखर के ढेह जाना

    मुझको बेहद उदास करता है
    ख़ास लोगों का आम रह जाना
    Read Full
    Vishal Bagh
    43 Likes
    तू मोहब्बत नहीं समझती है
    हम भी अपनी अना में जलते हैं

    इस दफा बंदिशें ज़ियादा हैं
    छोड़ अगले जनम में मिलते हैं
    Read Full
    Ritesh Rajwada
    54 Likes
    बे-ख़ुदी बे-सबब नहीं 'ग़ालिब'
    कुछ तो है जिस की पर्दा-दारी है
    Mirza Ghalib
    22 Likes
    न हों अशआर में माअनी न सही
    खुद कलामी का ज़रिया ही सही

    तुम न नवाज़ो शेर को, न सुनाएंगे
    ये मेरा ज़ाती नज़रिया ही सही
    Read Full
    Unknown
    19 Likes
    उसके वालिद नवाब हैं भाई
    उसको हक़ है हमें भुलाने का
    Deepak Sharma Deep
    29 Likes

More by Allama Iqbal

As you were reading Shayari by Allama Iqbal

    ख़ुदी हो इल्म से मोहकम तो ग़ैरत-ए-जिब्रील
    अगर हो इश्क़ से मोहकम तो सूर-ए-इस्राफ़ील

    अज़ाब-ए-दानिश-ए-हाज़िर से बा-ख़बर हूँ मैं
    कि मैं इस आग में डाला गया हूँ मिस्ल-ए-ख़लील

    फ़रेब-ख़ुर्दा-ए-मंज़िल है कारवाँ वर्ना
    ज़ियादा राहत-ए-मंज़िल से है नशात-ए-रहील

    नज़र नहीं तो मिरे हल्क़ा-ए-सुख़न में न बैठ
    कि नुक्ता-हा-ए-ख़ुदी हैं मिसाल-ए-तेग़-ए-असील

    मुझे वो दर्स-ए-फ़रंग आज याद आते हैं
    कहाँ हुज़ूर की लज़्ज़त कहाँ हिजाब-ए-दलील

    अँधेरी शब है जुदा अपने क़ाफ़िले से है तू
    तिरे लिए है मिरा शोला-ए-नवा क़िंदील

    ग़रीब ओ सादा ओ रंगीं है दस्तान-ए-हरम
    निहायत इस की हुसैन इब्तिदा है इस्माईल
    Read Full
    Allama Iqbal
    यक़ीं मोहकम अमल पैहम मोहब्बत फ़ातेह-ए-आलम
    जिहाद-ए-ज़िंदगानी में हैं ये मर्दों की शमशीरें
    Allama Iqbal
    22 Likes
    न तू ज़मीं के लिए है न आसमाँ के लिए
    जहाँ है तेरे लिए तू नहीं जहाँ के लिए

    ये अक़्ल ओ दिल हैं शरर शोला-ए-मोहब्बत के
    वो ख़ार-ओ-ख़स के लिए है ये नीस्ताँ के लिए

    मक़ाम-ए-परवरिश-ए-आह-ओ-लाला है ये चमन
    न सैर-ए-गुल के लिए है न आशियाँ के लिए

    रहेगा रावी ओ नील ओ फ़ुरात में कब तक
    तिरा सफ़ीना कि है बहर-ए-बे-कराँ के लिए

    निशान-ए-राह दिखाते थे जो सितारों को
    तरस गए हैं किसी मर्द-ए-राह-दाँ के लिए

    निगह बुलंद सुख़न दिल-नवाज़ जाँ पुर-सोज़
    यही है रख़्त-ए-सफ़र मीर-ए-कारवाँ के लिए

    ज़रा सी बात थी अंदेशा-ए-अजम ने उसे
    बढ़ा दिया है फ़क़त ज़ेब-ए-दास्ताँ के लिए

    मिरे गुलू में है इक नग़्मा जिब्राईल-आशोब
    संभाल कर जिसे रक्खा है ला-मकाँ के लिए
    Read Full
    Allama Iqbal
    अपनी जौलाँ-गाह ज़ेर-ए-आसमाँ समझा था मैं
    आब ओ गिल के खेल को अपना जहाँ समझा था मैं

    बे-हिजाबी से तिरी टूटा निगाहों का तिलिस्म
    इक रिदा-ए-नील-गूँ को आसमाँ समझा था मैं

    कारवाँ थक कर फ़ज़ा के पेच-ओ-ख़म में रह गया
    मेहर ओ माह ओ मुश्तरी को हम-इनाँ समझा था मैं

    इश्क़ की इक जस्त ने तय कर दिया क़िस्सा तमाम
    इस ज़मीन ओ आसमाँ को बे-कराँ समझा था मैं

    कह गईं राज़-ए-मोहब्बत पर्दा-दारी-हा-ए-शौक़
    थी फ़ुग़ाँ वो भी जिसे ज़ब्त-ए-फ़ुग़ाँ समझा था मैं

    थी किसी दरमाँदा रह-रौ की सदा-ए-दर्दनाक
    जिस को आवाज़-ए-रहील-ए-कारवाँ समझा था मैं
    Read Full
    Allama Iqbal
    की हक़ से फ़रिश्तों ने 'इक़बाल' की ग़म्माज़ी
    गुस्ताख़ है करता है फ़ितरत की हिना-बंदी

    ख़ाकी है मगर इस के अंदाज़ हैं अफ़्लाकी
    रूमी है न शामी है काशी न समरक़ंदी

    सिखलाई फ़रिश्तों को आदम की तड़प उस ने
    आदम को सिखाता है आदाब-ए-ख़ुदावंदी
    Read Full
    Allama Iqbal

Similar Writers

our suggestion based on Allama Iqbal

Similar Moods

As you were reading Attitude Shayari Shayari