ये अब जो मेरी ज़बाँ पर तुम्हारा नाम नहीं
इसे मुआ'फ़ी समझ लेना इंतिक़ाम नहीं
मुझे पता है जो तुझ को ख़ुदा समझते हैं
वही हैं जिन की ख़ुदा से दुआ सलाम नहीं
मिरे अलावा कोई मेरी बात सुनता नहीं
और आज-कल तो मैं ख़ुद से भी हम-कलाम नहीं
इसी लिए तो सुहूलत से जल रहे हैं चराग़
उन्हें पता है हवा का कोई निज़ाम नहीं
तो फिर वो मेरे लिए अहमियत नहीं रखता
किसी के दिल में अगर तेरा एहतिराम नहीं
— Aman Shahzadi















