jab jazba ik baar jigar men aata hai | जब जज़्बा इक बार जिगर में आता है

  - Amit Sharma Meet

जब जज़्बा इक बार जिगर में आता है
फिर सब अपने आप हुनर में आता है

सब की ज़द में इक मेरा ही घर है क्या
रोज़ नया इक पत्थर घर में आता है

कल मेरे साए में उस की शक्ल दिखी
मंज़र ऐसे पस-मंज़र में आता है

मैं तन्हा आता हूँ महफ़िल में यारों
बाक़ी हर इंसाँ लश्कर में आता है

लहजा उस का हर जानिब है मुसल्लत यूँँ
वो बंदा हर बार ख़बर में आता है

दहशत उस लम्हे की दिल में इतनी है
अक्सर ही वो लम्हा डर में आता है

'मीत' सभी का साथ यहाँ पर देता है
जो कोई भी बीच सफ़र में आता है

  - Amit Sharma Meet

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