sach kehne ka aakhir ye anjaam hua | सच कहने का आख़िर ये अंजाम हुआ

  - Amit Sharma Meet

सच कहने का आख़िर ये अंजाम हुआ
सारी बस्ती में मैं ही बदनाम हुआ

क़त्ल का मुजरिम रिश्वत दे कर छूट गया
क़िस्मत देखो मेरे सर इल्ज़ाम हुआ

मेरे ग़म पर वो अक्सर हँस देता है
ये तो ग़म का ग़ैर मुनासिब दाम हुआ

ज़ख़्म यहाँ तो वैसे का वैसा ही है
तुम बतलाओ तुम को कुछ आराम हुआ

तन्हाई ने जब से क़ैद किया मुझ को
बाहर आने में तब से नाकाम हुआ

रोज़ मसाइल घेरे हैं मुझ को तो अब
सोच रहा हूँ गर्दिश-ए-अय्याम हुआ

अख़बारों में ख़ुद को पढ़ते सोचूँ हूँ
'मीत' यहाँ पर मेरा भी कुछ नाम हुआ

  - Amit Sharma Meet

Udasi Shayari

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